जाने क्या सोच कर तेरे दर पर दस्तक दी
मालूम था की तू सामने न आयगा फिर भी दस्तक
दी शायद एक आस थी दिल में की तू चला आए
तेरे दीदार को तरसे हम जितना तू भी तरसा होगा
यही सोच कर दस्तक दी
दर खुला नज़र तू न आया
आँखे ख़ुद ब ख़ुद झुक
गई कदमों ने बढ़ना चाहा पर इजाजत न मिली
तू शायद सामने
आए यही सोच कर फिर दस्तक दी
पूछने पर तेरे गुजर जाने का मालूम हुआ
तेरी मैयत पर आए आ कर दस्तक दी
शायद कयामत में मिले यही सोच कर दस्तक दी
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